भारत में लाखों पढ़े-लिखे युवा हर साल सरकारी नौकरी की आशा में विभिन्न परीक्षाओं में भाग लेते हैं। हरियाणा में लगभग 13 लाख शिक्षित बेरोजगार हैं। तीन लाख से अधिक सरकारी पद रिक्त हैं, परंतु नियुक्तियाँ ठप हैं। ओवरऐज हो चुके उम्मीदवार सरकार से जवाब चाहते हैं, लेकिन जवाब न नीति में है न नीयत में। बीटेक, पीएचडी, एमए और एलएलबी धारक युवा अब चपरासी की नौकरी को भी सौभाग्य मानने लगे हैं। यह केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतिभा के अवमूल्यन की त्रासदी है — जिसे अब अनदेखा करना देश के भविष्य से खिलवाड़ होगा।
हरियाणा ही नहीं, पूरे देश में एक शब्द बड़े यत्न से बोला जाता है — सीईटी। नाम से ही लगता है मानो यह कोई पर्व हो, उम्मीदों का उत्सव, जहां युवाओं को मिलेगा वह दरवाज़ा, जो वर्षों से बंद था। पर असलियत में यह एक ऐसा मेला है, जहां सपने बिकते हैं, उम्मीदें कतार में लगती हैं, और योग्यता ठगी जाती है।
यह कोई साधारण परीक्षा नहीं, यह उस पीढ़ी का दर्पण है जो विश्वविद्यालयों से निकलकर दरबानों की ड्यूटी के लिए फॉर्म भर रही है। पीएचडी धारक युवा जब ग्रुप डी की नौकरी के लिए परीक्षा देते हैं, तो यह शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि हमारी सोच की पराजय है।
देश की सड़कों पर, पसीने में लथपथ हजारों युवा अपनी डिग्रियों का बोझ उठाए परीक्षा केंद्रों की ओर बढ़ रहे होते हैं। यह कोई धार्मिक यात्रा नहीं, यह मजबूरी की यात्रा है। चेहरे पर न श्रद्धा है, न आत्मविश्वास — केवल प्रश्नचिन्ह हैं, और पांवों में फटे जूते।
कितनी अजीब बात है कि जहां लाखों पद रिक्त हैं, वहां भरती नहीं होती। जहां युवाओं की क्षमता फलने-फूलने को तड़प रही है, वहां सरकारें केवल परीक्षा कराने में व्यस्त हैं। लगता है जैसे अब शासन का धर्म ही यह रह गया है कि वह युवाओं को टेबल के इस पार से उस पार घुमाए, चयन की भूलभुलैया में उलझाए, और समय की रेत में उनके भविष्य को बहा दे।
यह व्यवस्था अब युवाओं के लिए “सुनहरा अवसर” नहीं, एक शोषण चक्र बन चुकी है। जिन आंखों में कभी वैज्ञानिक बनने के स्वप्न थे, वे अब कम्प्यूटर ऑपरेटर बनने की याचना कर रही हैं। जिन हाथों में किताबें थीं, वे अब प्रवेश पत्र थामे, परीक्षा भवनों के गेट पर ठिठक रहे हैं।
हर बार नई परीक्षा, हर बार नई घोषणा — लेकिन न कोई निश्चित परिणाम, न कोई समयबद्ध नियुक्ति। तब तक उम्र की सीमा लांघ चुके युवा केवल आहें भर सकते हैं, क्योंकि यह देश शायद अनुभव से नहीं, उम्र से नौकरी बांटता है।
“बिना सिफ़ारिश, बिना रिश्वत” की बातें कागज़ों में अच्छी लगती हैं। ज़मीन पर आज भी वे ही आगे हैं जिनकी जेब भारी है या जिनका किसी ऊँचे दरबार से कोई रिश्ता है। और जो साधारण हैं, जो केवल योग्यता पर भरोसा करते हैं — वे सीईटी की कतार में खड़े हैं, कई बार।
यह कैसी परंपरा है जहां शिक्षक भी अपनी डिग्री समेटे बस अड्डों पर ड्यूटी देने भेजे जाते हैं? यह कोई प्रशासकीय व्यवस्था नहीं, यह अपमान का मूक उत्सव है। शिक्षकों से लेकर शिक्षार्थियों तक, सबको इस चक्रव्यूह में उलझा दिया गया है।
और सबसे ज़्यादा त्रासदी यह है कि यह सब एक सामान्य स्थिति बन चुका है। न सत्ता में बैठे लोगों की आत्मा कांपती है, न विपक्ष की नींद टूटती है। मानो यह “बेरोजगारी पर्व” किसी सर्वसहमति से मनाया जा रहा हो। युवा पूछते हैं — क्या कोई सुनेगा हमारी बात?
पर हर उत्तर मौन में लिपटा है।
जो युवा कल तक समाज का निर्माण करना चाहते थे, वे आज किराये के कमरों में बैठकर OMR शीट भरने की कला सीख रहे हैं। जिनके पास काबिलियत थी, वे अब कोचिंग सेंटरों के विज्ञापनों में बदल चुके हैं। शिक्षा अब ज्ञान नहीं, केवल अंकों की खरीद बन गई है — और नौकरियां केवल किस्मत का खेल।
जब कोई बीटेक युवा ग्रुप डी की परीक्षा देता है, तो वह केवल नौकरी नहीं ढूंढ रहा — वह अपने आत्मसम्मान की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। और जब वह हार जाता है, तो वह समाज भी हार जाता है जिसने उसे केवल डिग्री दी, अवसर नहीं।
युवाओं की ये भीड़, जो हर परीक्षा में भाग लेती है, अब भीड़ नहीं रही। यह एक प्रतीक्षा है, एक यंत्रणा है — जो हर परीक्षा केंद्र के बाहर आकार लेती है और हर परिणाम की घोषणा के साथ निराकार हो जाती है।
सरकारें यदि चाहें तो यह क्रम तोड़ सकती हैं। वे फैक्ट्रियाँ खोल सकती हैं, रोजगार सृजन कर सकती हैं, युवाओं की ऊर्जा को दिशा दे सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता — क्योंकि हम केवल “सिस्टम” चला रहे हैं, “संवेदना” नहीं।
अब समय आ गया है कि युवा केवल परीक्षा न दें, सवाल पूछें। केवल फॉर्म न भरें, मंच बनाएं। ये सिर्फ संघर्ष नहीं, अस्मिता का प्रश्न है। और अगर यह नहीं बदला गया, तो आने वाले समय में यह ठहरी हुई चुप्पी, एक क्रांति की चीख में बदल सकती है।
यह सिर्फ हरियाणा की कहानी नहीं है — यह पूरे देश के युवाओं की कथा है। और इस कथा का अंत दुखद न हो, इसके लिए हमें अब जागना होगा।
— प्रियंका सौरभ —
































































































































































































































































































































































































































































































































































